मुहब्बत या ज़रूरत

लेखक – उमैर सिद्दीकी , हुसैन गंज लखनऊ ढूंढ़ने निकला था लफ़्ज़े इश्क़ के मायनें मैं गुज़रा महबूबा की गलियों से लेकर  माँ के आँचल

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हिंदी भाषा ही नही भारतीयों की माँ है।

लेखक – शुभांशु जैन शहपुरा *जब मां का जिक्र आता है तो उसी माँ की ममतामयी सूरत याद आती है जिसके माध्यम से हमारा

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आँसुओ को पनाह नहीं मिलती

लेखक – पी राय राठी,भीलवाड़ा दर्दे ए दिल की किसी को दवा नहीं मिलती तो कभी आँसुओं को_पनाह_नहीं_मिलती। मुद्दते हो गई अपने आप में

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ना बदला है अब तक ना किसी साल बदलेगा

लेखक – उमैर सिद्दीकी हुसैनगंज लखनऊ  ना बदला है अब तक ना किसी साल बदलेगा इस दुनियाँ में शायद कभी ना मज़लूमों का हाल बदलेगा

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