Youth Icon : जब लगे लाइफ में क्या हो रहा हैं, सीखने का वो बेस्ट टाइम – आयुष श्रीवास्तव

“कुछ ना होने पर भी जिनकी हिम्मत उनके साथ खड़ी होती है,मंज़िल खुद उन तक आने का रास्ता तय करती है “
-कशिश पारवानी

ये शब्द भले हमारे है पर ज़ज़्बात हमारे आज के आइकॉन से जुड़े है। उनकी कहानी हमें यही सिखाती है।लाइफ में हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए। यही वो चीज़ है जो आपको दूसरों से अलग बनाती है। ये कहना है हमारे इस महीने के आइकॉन का। आज हमारे साथ जुड़े है TVF Web Series के Creative Producer आयुष श्रीवास्तव का। जो हमारे जबलपुर के है।जिन्होंने हमारे साथ अपने सफर की कई सुनी अनसुनी कहानी शेयर की।

अपनी कहानी के बारे में बताइये

आयुष – मैंने चेन्नई से इंजीनियरिंग की है। जबलपुर में भी रहा हूँ मैं। बात अगर कैरियर की करें। तो ऐसा लगता है मैंने इस प्रोफेशन को नही बल्कि इस प्रोफेशन ने मुझे चुना। मेरी जॉब लग चुकी थी पर जॉइनिंग डेट नही आई थी। तो तब मैं ऑनलाइन फ़िल्म मेकिंग सीखता ही था। फिर मैंने WITTYFEED में इंटर्नशिप की और VFX Editor बना। 1 साल बाद मैं वहाँ का पोस्ट प्रोडक्शन का हैड बन गया था। उसके कुछ समय बाद मैंने TVF जॉइन की।

जबलपुर आकर कैसा लगता है?

आयुष – मैं 4-6 महीने में घर वालो से मिलने आता हूँ। ज्यादा रहा नही हूँ यहाँ तो पहचान थोड़ी कम है पर नए लोगो से मिलता हूँ। कुछ 2-4 जगह है जहाँ जाता हूँ जैसे द्वारका के समोसे खाने। एक दिन यहाँ कुछ तो करेंगे। यहाँ कुछ करना चाहता हूँ जैसा बाकी शहरो में हो रहा है। धीरे धीरे यहाँ का भी डेवलपमेंट हो रहा है।

कभी सोचा था इस लेवल तक पहुँचेंगे ?

आयुष -अभी तो महज़ शुरुआत है। अभी तो चखा है कतरा बस, पूरा आसमान चखना अभी बाकी है। हाँ जब काम कर रहा था तो पता था कर तो लूँगा। ऐसा नही है कि अब आराम से जी रहे है अभी बहुत सारी चीज़े है। अब तो सफर शुरू हो रहा है जिसमे हम वो कर सकते है जो हम करना चाहते है। अगर लगातार कोशिश करते रहेंगे तो कुछ न कुछ तो होगा ही। भले समय लगे पर होगा। कभी ऐसा नही सोचना चाहिए कि अब सब मिल गया। ज़िन्दगी सफर है उसके मज़े लेते है।

आगे का क्या प्लान है ?

आयुष – 3 महीने से ज्यादा का तो मैं सोचता भी नही। पर हाँ कुछ अच्छे आईडिया है जिस पर काम करना है। सबसे बड़े प्लान की बात करें तो मुझे मेरे घर पर टेनिस कोर्ट चाहिए।

आईडिया कहाँ से लाते है ?

ये तो ट्रेनिंग वाली बात है। अगर आप घर पर बैठे हो और स्टार्ट करते है तो ज्यादा एक्सपोजर नही मिलता। जितना ज्यादा लोगों से मिलोगे,डिस्कशन करोगे उतना बेहतर आईडिया मिलता है। पढ़ेंगे,देखेंगे और इंस्पिरेशन मिलेगी। ज्यादा लोगो के साथ बेटर आईडिया मिलता है। एक बात और आईडिया तब तक काम का नही जब तक आप उसकी स्टोरी नही बना सके। कभी अपने आईडिया से प्यार मत करो क्योंकि हो सकता है वो हमें बेस्ट लगे क्योंकि हमारा है पर आपको लोगो का भी ध्यान रखना ही पड़ेगा।

कहते है सक्सेस प्राइस टेग के साथ आती है। आपको क्या लगता है ?

आयुष – सक्सेस जैसा कुछ नही है कम से कम मेरी लाइफ में तो नही हैं। हाँ माइलस्टोन है। चेक लिस्ट है। इससे ये होता है कि ये हो गया अब नेक्स्ट। आपको पता होता है कि ये हो गया अब वो। मुझे लगता है जो हो गया वो उससे बेहतर हो नही सकता था। Pricetag बहुत छोटे समय के लिए होता है। अगर आप जो काम कर रहे हैं उसमें एन्जॉय कर रहे है तो वो अखरती नही है।

कभी ऐसा लगा कि लाइफ में ये क्या हो रहा है ?

आयुष -तब लगा था जब कॉलेज के बाद मेरी joining नही हुई थी। तब ऐसा लगता था मैं एक्टिव भी सब करता हूँ पर फिर भी ऐसा। ये वो टाइम था जब मैं फिल्म मेकिंग सीख रहा था। अब लगता है वो बेस्ट टाइम था,क्योंकि अगर वो नही होता तो आज ये भी नही होता। उस समय मैंने जो सीखा वो बहुत काम का था। हर किसी को कभी न कभी तो लगता ही है कि वो यूजलेस हैं पर वो बेस्ट टाइम होता है सीखने के लिए। ये समय ये मौके आपको सीखने के अवसर देते है। तो जब भी लगे लाइफ में ये क्या हो रहा है वो सीखने के लिए बेस्ट टाइम है। ये बेरोज़गारी के पल फिर नही मिलते।

आपकी लाइफ की फिलोसॉफी क्या है ?

आयुष – हर 3 महीने में कुछ न कुछ सीखना चाहिए। मैं सेम काम ज्यादा समय नही कर सकता। मुझे खुद में प्लस वन ऐड करना होता है। अगर आप 3-4 महीने में कुछ न कुछ सीखते है तो आप अपग्रेड होते है। और जितना जल्दी हो सके फेल हो जाइए क्योंकि जितना जल्दी हारेंगे उतना जल्दी फिर से खड़े होकर सीखेंगे। So Fail First…

आप क्या मेसेज देना चाहेंगे ?

आयुष – बस यही की फिलोसोफी को अच्छे से फॉलो करो। और अपने बारे में सोचो। अगर आपको लग रहा है कि ये काम करना चाहिए आप कॉन्फिडेंट है तो बस कर जाइये। ऐसे भी बहुत लोग है जिन्होंने लगातार कोशिश करते करते अचीव किया है और ऐसे भी जो कोशिश ना करने के कारण कुछ नही कर पाए।

तो ऐसी थी हमारी और आयुष श्रीवास्तव की खास बातचीत। जिन्हें मिल कर यही लगता है कि,

“जिस खुशी की तलाश में ज़िन्दगी तू दर दर भटकती है,वो कहीं और नही तेरे अंदर ही पलती है” – कशिश पारवानी

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