बात जो अब समझ आयी – कशिश पारवानी

लेखक- कशिश पारवानी (KashishKeKisse),Content Editor

आज से 6 साल पहले एक फिल्म देखी थी जिसका काफी गहरा असर हुआ था मुझ पर फिल्म का नाम था ये जवानी है दीवानी। इस फिल्म को पसंद करने का कारण ये था की इस फिल्म में सपनो को काफी महत्वपूर्ण दिखाया गया था। इस फिल्म में साफ़ प्रदर्शित किया गया था की सपनो को जीने की एक कीमत होती है जिसे चुकाने की ताकत सभी में नहीं होती। तब मैं 14 साल की थी जब ये फिल्म देखी और शायद तब ही मुझे सपनो के बारे में पता चला था। इस फिल्म की एक और खास बात थी वो थे उसके डायलॉग्स। भावनाओ को शब्दों में बड़ी ही खूबसूरती से पिरोया गया था इस फिल्म में। उन्ही में से एक डायलाग था की सही समय पर निकल जाना चाहिए वरना गिले शिकवे होने लगते है,तब मैं इस बात तो समझ नहीं पायी थी क्योकि तब यही लगता था की जब अपने है तो आपस में गिले शिकवे कैसे? और जाना समाधान कैसे ?

बहरहाल काफी समय बीत गया। मैं बड़ी भी हो गयी पर ये बात मेरे कभी समझ नहीं आयी पर आज समझ आ गयी। जब हम किसी के साथ रहते है तो हमे उनकी आदत हो जाती है। साथ रहते रहते हम अपनी साड़ी बाते बांटने लगते है। ख़ुशी हो या तकलीफ सभी में उन्हें हिस्सेदार समझते है,और ये मान लेते है की ये रिश्ता कभी नहीं छूटने वाला,लेकिन ऐसा कभी नहीं होता। जिसे दोस्त समझकर आप अपना दर्द बांटते है पता नहीं चलता की वही इंसान आपको कब दर्द देने लग गया। हर इंसान की अपनी एक निजी ज़िन्दगी भी होती है जिसमे कई नए लोग आते है और इंसानो से फितरत है जब भी उन्हें नए लोग मिलते है अक्सर पुराने छूट जाते है। कहते है रिश्तो की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती पर सोच कर देखो हर रिश्ता एक मोड़ पर आकर छूटा है। हम रिश्तो में दिमाग नहीं चलते बस इसलिए वो हमे बेवकूफ समझते है। अब देखते है तो फिल्म ये जवानी है दीवानी में कही गयी ये बात बिलकुल सही है, हंसी ख़ुशी के ही माहौल में सबसे दूर जाना बेहतर है क्योकि आपको पता भी नहीं चलेगा कि कब आपकी नादानियाँ उन्हें बचकानी बेवकूफियां लगने लगी, कब आपकी जगह किसी और को दे दी गयी,कब उनके दिल में दोस्ती की जगह शिकायतों ने ले ली, और सही भी है लाइफ में आना जाना लगा रहना चाहिए। सुपरहीरो मार्वल की इस दुनिया में इंसानो के ज़ज़्बातो की कदर का कोई सवाल ही नहीं उठता।

जिंदगी की राहो में कई लोग ऐसे मिलते है जिनका साथ महज़ तब तक का होता है जब तक कोई और ना आ जाये। बात दोस्ती की करे तो वो दोस्त ही क्या जो आपको अकेला छोड़ दे दोस्त तो वो होता है जो दुनिया छोड़ कर भी आपके साथ रहे, पर ऐसे दोस्त सभी की किस्मत में नहीं होते। कई बार बात बड़ी नहीं होती पर उसकी तकलीफ बड़ी होती है। शायद बात करने से समाधान हो भी जाये पर बात करने की कोशिश हमेशा एक ही करे ज़रूरी तो नहीं। एक रात और कश्मकश में गुज़ार कर ये तो समझ आ गया की हमेशा साथ की उम्मीद करना ही बेमानी है, शिकायत के साथ रहने से साफ़ दिल से दूर जाना बेहतर होता है। ऐसे मौके पर गुलज़ार साहब की पक्तियां याद आती है,

कभी पत्थर की ठोकर से आती नहीं खरोच,
कभी एक ज़रा सी बात से इंसान बिखर जाता है

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