सिंधी नववर्ष आज, जानिए भगवान झूलेलाल की कहानी

आज गुढी पढ़वा के साथ चेट्रीचंड्र भी है। हिन्दू नववर्ष के साथ सिंधी नववर्ष भी आज से प्रारम्भ हो रहा है। सिंधी समुदाय के लिए आज का दिन विशेष महत्त्व रखता है। इसी दिन सिंधीयो के आराध्य देव झूलेलाल का अवतरण हुआ था। माना जाता है की भगवान विष्णु ने लोगो की रक्षा करने के लिए झूलेलाल भगवान का रूप लिया था। आइये आपको बताते है पूरी कहानी।

ये है कथा-

सिंध में प्राचीन काल में राजा मिरखशाह का राज था।वो अपनी प्रजा पर धर्म को लेकर अत्याचार करता था। उसके अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए लोगो ने लगातार चालीस दिन तक तपस्या की। उनकी आराधना से सिंधु नदी से भगवान विष्णु झूलेलाल के रूप में प्रकट हुए और लोगो को अत्याचार से मुक्ति दिलाने का वचन दिया। उसके बाद विक्रम संवत 1007 सन्‌ 951 ई. में सिंध प्रांत के नसरपुर नगर में रतनराय के घर माता देवकी के गर्भ से प्रभु स्वयं तेजस्वी बालक उदयचंद्र के रूप में अवतार लेकर पैदा हुए। उनमे कई अद्भुत खूबियां थी। इस कारण उन्हें लाल साई, और उडेरोलाल भी कहा जाता था।


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इसलिए कहलाये झूलेलाल

माना जाता है की उनका पलना भगवान की शक्तियों से खुद ही गतिमान होता था इस कारण उन्हें झूलेलाल कहा जाने लगा। धीरे धीरे उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ने लगी और राजा मिरखशाह को चुनौती दी गयी और उसे गलत साबित किया था। राजा ने भी बाद में अपनी गलती मानी और स्वयं भगवान झूलेलाल का भक्त बन गया।

पाकिस्तान में भी है भक्त

चेट्रीचंड्र को भगवान झूलेलाल के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। केवल भारत में नहीं बल्कि पाकिस्तान में भी ये पर्व धूम धाम से मनाया जाता है। भगवान झूलेलाल की समाधि पाकिस्तान में है। उनकी समाधि में हिन्दुओ के साथ मुस्लिम भी बढ़ी तादाद में आते है। भगवान झूलेलाल कमल के पुष्प और मत्सय में विराजमान है। कमल और मत्सय समृद्धि के प्रतिक माने जाते है। इसका अर्थ है की जहाँ भी भगवान झूलेलाल का स्मरण होगा वह समृद्धि आएगी।

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