बेटों की विदाई नज़र अंदाज़ कर जाते हैं लोग

लेखक –उमैर सिद्दीकी , हुसैन गंज लखनऊ

होती हैं विदा बेटियाँ तो रस्मन ही सही आंसू बहाते हैं लोग
आखिर कियूं बेटों की विदाई नज़र अंदाज़ कर जाते हैं लोग
यूँ तो बाँट ही रख्खा है हमनें खुद को जातियों में मज़ाहिब में
अफ़सोस की फौजियों की शहादत पे भी परायापन दिखा जाते हैं लोग
बड़े बड़े भाषण बड़ी बहसें चलती हैं सदनों में उनके बीच
भेजते ही नहीं हैं अपने बेटों को कभी फ़ौज में जो लोग
सूना है पहले हुवा करते थे सेनानायक बेटे बादशाहों के
फिर कियूं गुज़र कर आज सरहदों से आते नहीं हैं ये नेता लोग
आता है जब भी चुनावों आतंकवादी हमला ज़रूर होता है
ज़द में हमलों की आते नहीं हैं कियूं कभी कोई कद्दावर लोग
मियाँ लगा कर बाज़ी जिनकी जानों की तुम अपनीं कुर्सियां बचाते हो
रखी हैं कुर्सियां तुम्हारी जिनकी लाशों पे इस देश की आन बान शान हैं वो लोग
रखनीं हैं सलामत गर जानें अपने फौजियों की तो क़ानूनें वतन कुछ यूँ करिये
सदन तक पहुंचें बस वो आये हों गुज़ार के वक़्त हिफ़ाज़ते सरहद में जो लोग 


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