रोक सका ना क़लम मैं

लेखक – उमैर सिद्दीकी , हुसैन गंज लखनऊ

छुई भी नहीं क़लम और लिखता चला गया

आह आह में जुर्म ये कैसा करता चला गया

अब मिलेगी सजा कैसी अंजाम मेरा क्या होगा

रोक सका ना क़लम मैं लिखता उसे बेवफा चला गया

यक़ीनन होगा वो ग़ज़बनाक फिर मेरी जुर्रत पर किसी मोड़ पे

जो आज मेरे बोलने पर बोला मुझे जाहिल अनपढ़ और चलता चला गया

अजब है ज़र्रा नवाज़ी देखो रब्बे ज़ुल्जलाल की सीख ना सका

जो अलिफ़ बे लिखता वो भी दास्तानें दुनियाँ चला गया

सिवा दुआओं के माँ की भला ये ताक़त कौन सी रही होगी

की बिना तैरना सीखे ही उमैर तू करता दरिया पार चला गया

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