देख बिन आंसू रो रहा हूँ मैं,

लेखक –  रूचि तिवारी, जबलपुर ।

देख बिन आंसू रो रहा हूँ मैं,
अंदर ही अंदर सो रहा हूँ मैं ,
वक्त का तकाज़ा नहीं मुझे,
खुद में ही बिखर सा रहा हूँ मैं।

सितमकरत सा हो रहा हूँ मैं,
उसकी सितमगरी सह रहा हूँ मैं,
कुचल कर कितनी ही अभिलाषाएं
तेरी यादो के सहारे जी रहा हूँ मैं।

सज़दा ए शुकराना तेरा ए खुदा ,
अक्स ए नुसलसल दर्द का झेल रहा हूँ मैं,
बंदगी है वो मेरी माँ की,
जिसके सहारे जीवित खड़ा हूँ मैं।

आसमान छूने की ख्वाहिश रखा हूँ मैं,
इस कैदखाने में भी कितना रिहा हूँ मैं,
मुतमइन हो जा ए ज़िन्दगी ,
खुद से ही निखर रहा हूँ मैं।

देख बिन आंसू…….

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