Movie Review : दमदार अदाकरी और ज़ोरदार एक्शन से आपको बांधेगी “मणिकर्णिका”

कंगना राणावत को देख कर लगता है ये किरदार बना ही उनके लिए है। कंगना की दमदार एक्टिंग ने इस किरदार में और जान दाल दी है। खुद लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी सुभद्रा कुमारी चौहान ने इस पंक्ति से झाँसी की रानी को अमर कर दिया और कंगना ने भी अपनी अदाकारी से यही किया है।

कहानी       

फिल्म की शुरुआत अमिताभ बच्चन की दमदार अवाज से होती है। अमिताभ बच्चन की आवाज सुनकर आपको लगान की यादें ताजा हो जाएगी। पेशवा (सुरेश ओबेरॉय) की दत्तक बेटी मणिकर्णिका उर्फ मनु जन्म से ही साहसी और सुंदर हैं।  ऐसे में राजगुरु (कुलभूषण खरबंदा) की निगाह उन पर पड़ती है। मनु के साहस और शौर्य से प्रभावित होकर वह झांसी के राजा गंगाधर राव नावलकर (जीशू सेनगुप्ता ) से उसकी शादी करते हैं। ऐसे में मनु झांसी की रानी बनती है।झांसी की रानी को अंग्रेजों के सामने सिर झुकाना कभी गवारा नहीं था। वह झांसी को वारिस देने पर खुश है कि अब उसके अधिकार को अंग्रेज बुरी नियत से हड़प नहीं पाएंगे। मगर घर का ही भेदी सदाशिव (मोहम्मद जीशान अयूब) षड्यंत्र रचकर पहले लक्ष्मीबाई की गोद उजाड़ता है और फिर अंग्रेजों के जरिए गद्दी छीन लेता है।

एक्टिंग

सबसे पहले कंगना रनौत की एक्टिंग की बात करें तो उनकी परफॉर्मेंस को देखकर लगता है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का रोल उन्हीं के लिए बना था। शायद इस फिल्म में उनकी परफॉर्मेंस क्वीन को भुला दे। हालांकि, झलकारी बाई के रोल में अंकिता लोखंडे को ज्यादा स्क्रीन टाइम नहीं दिया गया है। लेकिन,अपनी पहली फिल्म में वह अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में कामयाब रही हैं।

मजबूत कड़ी

मेकर्स ने इस फिल्म के स्केल का खूब ध्यान रखा है। फिल्म का बेस्ट पार्ट इसका एक्शन है। चाहे वो खुद कंगना रनौत हो या फिर टीवी से बॉलीवुड में कदम रखने रही एक्ट्रेस अंकिता लखंडे। दोनों को पर्दे पर तलवारबाजी करते हुए देखना रोमांचक है। फिल्म का बैग्राउंड म्यूजिक और साउंड 1857 की क्रांति जैसा ही जोश भर देगा। अब बात करें डायरेक्शन की। फिल्म को राधा कृष्ण, जगरलामुदी के अलावा मुख्य रूप से कंगना ने डायरेक्ट किया है। कई विवादों और आपसी टकराव के बाद भी कंगना ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है।  ये डायरेक्शन का ही कमाल है कि फिल्म के आखिरी 40 मिनट आपके रौंगटे खड़े कर देंगे। 

कमजोर कड़ी 

फिल्म के पहले हाफ के मुकाबले इसका सेकंड हाफ इसकी कमजोर कड़ी है। वहीं, फिल्म में कंगना के बोलने का तरीका काफी खराब है। इसके अलावा फिल्म में निरंतरता की कमी भी साफ नजर आ रही है। फिल्म का सबसे कमजोर हिस्सा इसके विलेन थे। फिल्म के विलेन का रोल निभा रहे एक्टर्स में चमक की कमी लगी। इस फिल्म ने फिर साबित कर दिया है कि विदेशी एक्टर को हिंदी बुलाना अभी भी टेढ़ी खीर है।

तो देखें या ना देखें?

मणिकर्णिका में ऐसे कई मूमेंट्स हैं जो आपको स्क्रीन में बांधकर रखेंगे। वहीं, कंगना की परफॉर्मेंस देखने के लिए आप जरूर जेब ढीली करना चाहेंगा। इसके अलावा रिपब्लिक डे की छुट्टी के मौके पर अगर आप अपनी फैमिली और फ्रेंड्स के साथ फिल्म देखने का मन बना रहे हैं तो मणिकर्णिका सबसे अच्छा ऑप्शन है।    

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