मुहब्बत या ज़रूरत


लेखक – उमैर सिद्दीकी , हुसैन गंज लखनऊ

ढूंढ़ने निकला था लफ़्ज़े इश्क़ के मायनें मैं

गुज़रा महबूबा की गलियों से लेकर 

माँ के आँचल तक

बस पायी ना खबर कल्बे माँ की

बाक़ी छान आया ख़ाक सारी दुनियाँ

कीजानें कौन कौन चिल्ला रहा था हूँ

आशिक़ मैं हूँ आशिक़ मैंपर देखा जा कर

क़रीब से जिसे भीथा ज़रूरत का पुजारी

हर शख्सक्या मुहिब्बे जवानी रहा हो

क्या की कोई बच्चा सा करता हुवा

शैतानी रहा होहो वो बूढ़ा कोई अस्सी बरस का 

या आहें भरता हुवा कोई नौजवाँ अट्ठारह बरस का

या की बच्चा कोई दुधमुहाँ हो

सब ही की है चाहत हो पूरी ज़रूरत

और क्या लक़ब दिया है अपनीं ज़रूरत को 

मुहब्बत एक बच्चे से ले कर एक बूढ़े तक

पिछली सदी की शुरुवात से ले कर अबतक मिला है

क्या कोई ऐसा शख्स हुयी हो

जिसको किसी ऐसी शय से मुहब्बत हो ना

उसे जिसकी बिलकुल ज़रूरतएक मासूम से ब

च्चे को भी सताती है उसी वक़्त अक्सर

माँ की मुहब्बत होती है जब उसको

कोई ज़रूरी हाजत जैसे की पीना दूध हो

या फिर सोने के लिए चाहिए

माँ की गोद हो बदलती है

जैसे जैसे ज़रूरत इंसान की बदल जाती है

वैसे वैसे चाहत इंसान कीपाओं पाओं

जैसे चलने लगता है उसकी चाहतों का दायरा

बढ़ने लगता हैपहले पहचान थी

सिर्फ माँ कीअब बाप को भी पहचान लेता है

और थोड़ा बड़ा होते ही वो दोस्त नए तालाश लेता है

और फिर पहुंचे जो दौरे नौजवानी मेंमहबूबा

किसी क़द्र जल्दी तलाश लेता है

फिर आता है नंबर अधेड़ उमरी काबंट जाती है

उसकी चाहतें अब औलादों बीवियों में

गर गलती से हों ज़िंदा माँ बापतो

परेशाँ वो उनसे किसी क़द्र होता है

फिर आने लगता है बुढ़ापा उसपे अब याद रहती नहीं है

अक्सर अपनीं ही उसेहां

जवान बेटे को वो आहटों से पहचान लेता है

सुनीं ना थी जिसनें ऊँची आवाज़ कभी बाप

की आज बेटे की आवाज़ पे काँप काँप जाता है 

सो प्यारे है दुनिया में वजूद सिर्फ ए

क चीज़ का कहते हैं जिसे साफ़ लफ़्ज़ों में यार

ज़रूरतहाँ उसके लिबास को कह सकते हो

तुममुहब्बत मुहब्बत मुहब्बत इश्क़ो मुहब्बत

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