कभी चराग तुम एक जला कर तो देखो

लेखक – उमैर सिद्दीकी , हुसैन गंज लखनऊ

कौन कहता है मर जाते हैं लोग 

बस चलते चलते ज़रा थक जाते हैं लोग

कभी चराग तुम एक जला कर तो देखो

 अंदाज़ा हो जाएगा रौशनीं को किस कर तरसते हैं लोग

अजब कहानीं है दुनियाँ की अजब नज़ामें दुनियाँ हैं

मयखानों के मालिक भी लोग

जामों को तरसते भी हैं लोग

हर शख्स है खुद में यहां शख्सियत खुद बेहतरीन 

और तलाश में बेहतरीन दोस्त की खूब भटकते भी हैं लोग उ

मैर रहती है तलाश कियूं हमें दूसरों में सच्चों की अच्छों की

चाहते हैं देखना जैसा दूसरों को बन कियूं नहीं वैसे जाते हैं लोग

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