” धरती के चाॅद “

लेखक – चन्दन कुमार विश्वास , बिहार  

वह देखो ऋतुओं के गुलाम भीषण शीतलहर में

भीगी पलकें गिरा के;

तरपा रहें हैं अपने होठों की मुस्कान;

ठिठुर रहा है चाँद ।

छित-विछित हैं नभ के तारे छुप गया है

जुगनु प्यारे देखो खुला आसमान

दुसरो की खुशी के लिए ठिठुर रहा है चाँद ।

सारे जगत, ओस ,पाले कोहरे से ढँके

वह देखो रूका हुआ है वायुयान

कुछ नहीं पहिने ठिठुर रहा है चाँद ।

उसके देखने से हीं जगमगाई हैं

दुनिया जहाॅन ।

अब , कितना सताओगे उसे ? कब समझोगे ?

हर मौसम में परिश्रम करने वाले होते हैं भगवान !!।

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