हिंदी भाषा ही नही भारतीयों की माँ है।


लेखक – शुभांशु जैन शहपुरा

*जब मां का जिक्र आता है तो उसी माँ की ममतामयी सूरत याद आती है जिसके माध्यम से हमारा पालन पोषण हुआ ,जिसने हर दुख को सहकर हमारी खुशी के लिए अपना सर्वस्य समर्पित कर दिया। वह माँ हमारी जन्मदात्री मां है उसके उपकारो को चुका पाना किसी के लिए संभव नही है।*

*पर आज हम उस मां को भूल गए है जिसकी गोद में हमने शब्दो की अभिव्यक्ति सीखी है जिसके माध्यम से हमने पहला शब्द माँ  सीखा था ,पहली बार उच्चारित किया था ,ये हमे किसी ने सिखाया नही था अपितु हमने उस वातावरण में रहकर उन भावनाओं को जी कर अनुभूतियों में उतारकर स्वयं ही बोला था।वह  हिंदी माँ जिसके आँचल में हमने अपने हर सुख दुःख को दूसरों से बांटा,अपनी सोच समझने की क्षमता को विकसित किया पर समय रहते ही उस माँ को हमने क्या दिया….???*

*हाल तो ऐसा हुआ कि जैसे घर मे कोई पराई स्त्री या कोई सौत आ जाने के कारण व्यक्ति अपनी पत्नी को भूल जाता है वैसा ही हाल हम भारतीयों ने अपनी हिंदी मातृभाषा का कर दिया है ।गुलामी से आजादी के बीच मे देश तो आजाद हो गया पर हमारी भाषा आज भी गुलामी की जंजीरों में जकड़ी है।*

*जहां हमे अपनी हिंदी मातृभाषा पर गौरव होना चाहिए था ।परन्तु उसी माँ को अपने शब्दों के माध्यम से प्रस्फुटित करने में हमे शर्मिंदगी महसूस होती है….*
*जिसकी उंगली पकड़कर हम चले आज उसे ही हमने अपाहिज कर दिया ,चार शब्द विदेशी भाषा के क्या सीख लिए खुद को विकसित कहने लगे ,परन्तु यह स्वयं से छलावा है ,देश से गद्दारी है और मायाचारी है उस मां से जिसने हमें अक्षर विद्या से परिपूर्ण बनाया पर हम उसे क्या दे रहे है यह विचार आज करना होगा!*

*हमारा बदलाब यहां तक रुका नही बल्कि हमने तो अपने देश का नाम भी वैसे बदल दिया जैसे अपनी माँ  के द्वारा दिये नाम की पहचान छिपाई हो अब उस मां के द्वारा राजा बेटा ना कहलाकर वो खुद को टफी कहलवाने में गर्व महसूस करता है। वैसे ही भारत को भारत ना कहकर हम दूसरों के गुलामी भरे नाम इंडिया को कहना पसन्द करते है।*

*आओ आज विश्व हिंदी दिवस पर कुछ प्रण करे कि हम अपनी मातृभाषा हिंदी का उतना ही सम्मान करेंगे जितना हम अपनी जननी का सम्मान करते है। उसे भारत ही कहे तब यह देश विश्व गुरु कहलायेगा*

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