अनुभूति

लेखक –   शशि कांत श्रीवास्तव

ये हाथ हैं या समय का चक्र 

जिसकी मुट्ठी में बंद है 

वक्त.

काल या नसीब का 

मानव का 

जो फिसलती जा रही है 

रेत की तरह –अनवरत 

वापस नहीं आने को, लौटकर 

करो सदुपयोग –उसका 

थाम लो 

और -उसे 

श्वेद बूंदों से सिंचित कर 

स्वर्ण सा बना लो 

जो बंद है -मुट्ठी में 

वक्त..                ||

इनकी तरह आप भी अपना रचना या विचार हमे भेज सकते है। हम उन्हें पब्लिश करेंगे आपके नाम और तस्वीर के साथ। अपनी रचना हमें orsunaonewsportal@gmail.com पर भेज सकते है।

         

191 total views, 3 views today

You May Also Like