लेके नाम श्री राम का

लेखक –उमैर सिद्दीकी ,हुसैनगंज लखनऊ 

 क्या हममें से भी है कोई जो जा रहा है

खबर तो यूँ उड़ी है जैसे की सारा ज़माना ही जा रहा है

शोरफा तो सारे ही बैठे हैं अपने अपने घरों पर

फिर ये कौन हैं ये ये इब्लीस हैं या की हैवान हैं जिनका काफिला जा रहा है

कल छापना जो तुम तो छाप देना की दंगाई वही वही हैं जिन्हें हम समझते हैं

अभी अभी है कहाँ पास तुम्हारे फुर्सत तुम देखो की जानिबे अयोध्या कौन क्यूँ जा रहा है

तुम्हारी फ़िक्र मंदिर जल्दी बनें उनकी फ़िक्र वोट बैंक सलामत रहे

जिस की किसी को फ़िक्र ही नहीं हाय मसला वो श्री राम को खाये जा रहा है

बैठे बैठे राम परलोक में ये सोंच रहे हैं की ये मेरे कैसे भक्त हैं या सब पाखंडी हैं

खातिर नफ़रतें फैलाने के कोई मेरा नाम उछाल रहा है कोई मस्जिदें गिराए डाल रहा है

ये लगते हुवे नारे ये रोडों का शोर पूंछ रहा है हमसे हैं ये कौन लोग

उमैर ये कैसा समाज है जहां पर लेके नाम श्री राम का किरदार को रावण के निभाया जा रहा है

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