पल पल व्यर्थ किये

लेखक –  पी राय राठी,भीलवाड़ा।

  जीवन का अर्थ समझ ना पाए

      पल पल व्यर्थ किए”  

      व्यर्थी हुए

      अंत समय मौत

      तज गई प्राणों को’

      अपने ही जीवन की 

      खुदअर्थी हुए।

 

      जीवन  शय हो कर “

      शव हुआ

      तन्द्रा में लीन सुधा हो गई 

      तन पिंजरे से दूर बैठ

      साँसे कहीं

      और खो गई 

      छोड़ काया  को हम 

      उड़ते  पंछी हुऐ।

      अंत समय मौत 

      तज गई प्राणो को

      तब जाकर हम अर्थी हुए। 

 

      प्रारब्ध अंत को 

      समझ ना पाए।

      जीवन भर भटक कर गूम आए।

      जीवन के शव होने की कथा,

      देह ज्वाला ,

      अब  पूछ रही व्यथा ।

      कि कितने मन से सत कर्म हुए।

      अंत समय मौत

      तज गई प्राणों को

      तब जाकर हम अर्थी हुए।

 

      विदेह होकर तन से

      अवसान से 

      मसान जा पहुँचे।

      अंतर्मन मन की यही रही, पीड़ा

      जीते जी क्यों न 

      मुक्ति धाम पहुँचे?

      जीवन भर रोये व्यर्थ यूँ ही

      मन चेतना के  “

      कब कहाँ, विश्राम हुए।

      अंत समय मौत

      तज गई प्राणों को

      तब जाकर 

      अपने शव की अर्थी हुए।

 

      जीवन के गुढ़ रहस्यों का

      चिंतन ना हो पाया ।

      आत्म ज्ञान से विमुख होकर

      मरती   रही सदैव काया ।

      मन से  मृत  किन्तु 

      देह से जिंदा होकर भी,

      पर  जीते जी श्मशान हुए।

      अंत समय मौत

      तज गई प्राणों को

      खुद के लिए खुद ही अर्थी हुए।

 

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