करूँ तारीफ़ इन खुशनुमा रुखसारों की या फिर आपके लहजे की दाद दूँ

लेखक – उम्मेर सिद्धकी,लखनऊ।

करूँ तारीफ़ इन खुशनुमा रुखसारों की या फिर आपके लहजे की दाद दूँ

जी चाहता है चुम लूँ इन पंखुड़ी नुमाँ लबों को कुछ इस तरह आपके अल्फ़ाज़ों की दाद दूँ

कहना चाहूँ जो महबूबा आपको तो लड़खड़ाने जुबां लगे और माबूद मेरा खुदा है

अब आप ही बताओ जोड़ूँ क्या रिश्ता आपसे आपको क्या खिताब दूँ

ज़माना पूंछ रहा है मुझसे मेरी उलझनों का सबब

कहिये ले लूँ आपका नाम या झूंठा कोई जवाब दूँ

हर शाम सोंचता रहता हूँ में तो बस आपको अब आप ही बताइये

जो करूँ कभी खुदएहतसाबी खुद की तो अपनीं गुज़री हुयी शामों का खुद को क्या हिसाब दूँ 

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