शायद माँ इसे ही कहते है

 लेखक -शुभांशु जैन

भले लड़खड़ाने लगे हैं ,

कदम मेरे

नहीं रही छत सर पर

मगर धरा पर कदम,

आज भी उठाये हुए हैं

बोझ रिश्तों का

 

भले नज़रों से दिखना, 

हुआ कम

नही देख सकती गहराई से

मगर दिख जाती है दूर से ही,

परिवार पर आने वाली

हर विपदा

 

छोड़ दिया है सुनना कानों ने,

धुन तरंगो की

सुन न सकी थाप ढोलक की

हाँ मगर चौक उठती हूँ

सुनकर सोते हुये भी

आह बच्चों की

 

भले न कर सकी शिकायत,

खामोश ज़ुबाँ

रही मौन सभी गुनाहों पे

सिले होंठ फड़फड़ाते हैं अब

देखकर दुनिया का

अच्छा बुरा

 

हो चुकी काया शिथिल अब,

ढलान पर

कमजोर पड़े धागे साँसों के

मगर बंधी है डोर आस की

अपने ही देंगे सहारा

गन्तव्य तक

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