धारा 497 हटाने के विरुद्ध एक रचना

लेखक  – गौरव शर्मा,हरसूद(म.प्र.)
एक नई रचना धारा 497 हटाने के विरुद्ध 
आज सुबह के अखबार  में एक खबर नई आयी है
पेट्रोल पर टैक्स के बदले ये धारा कौन सी हटवाई है
हम तो बढ़ती महंगाई का रोना रोकर सुबक रहे थे
पति पत्नी के संबंधों को ही वैधानिक समझ रहे थे
न्यायालय की न्याय व्यवस्था को संस्कारित मान रहे थे
नियम न्याय की पुस्तक को ही गीता कुरान मान रहे थे
संस्कारों में बंधी डोर को अब हंसकर तोड़ा जाएगा
सात वचनों के बने गठजोड़ को अब खुलकर छोड़ा जाएगा
कड़े गुलामी के बंधन को सहमति से तोड़ दिया जाएगा
आजादी के नाम पर अपनी वासना पुर्त किया जाएगा
लक्ष्मण रेखा की मर्यादा अब सीता खुद ही मिटाएगी
कलियुग के पन्नों पर रामायण नई रामकथा लिखवाएगी
जौहर में प्राण त्यागने वाली सब नारी भूली जाएगी
पुरुषोत्तम श्रीराम की नजरें अब कहीं रीझ ही जाएगी
कितनी पावन संस्कृतियों से भारत देश महान रहा
उतने ही पावन गंगा से संस्कारों का सम्मान रहा
चल रही काम की आंधी ने रिश्तों को तार तार किया
देह की बढ़ती भूख लालसा ने गरिमाओं को पार किया
है देश के न्यायालय तुम कहीं परिवारों को न बिखरा देना
ऐसा न हो कि आप बलात्कार को ही वैधानिक बतला देना

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