Movie Review :दिल को छूती है सुई धागा

जब-तब ऐसी मनमोहक फिल्में देखने को मिल जाती हैं, जो हमें आदर्शवाद से लबरेज़ कर देती हैं। यही नहीं ये हमें बड़े विचित्र ढंग से प्रेरित भी करती हैं। निर्देशक शरत कटारिया की फिल्म ‘सुई धागा-मेड इन इंडिया’ एक ऐसी ही फिल्म है,जिसमें बालीवुड की धुरंधर प्रतिभाओं ने अपने अभिनय का ऐसा जौहर दिखाया है कि दिल बाग-बाग हो जाता है।

यह दिल को छूने और सुकून देनेवाली फिल्म है। इसमें ग्रामीण-कस्बाई अंचल की नाटकीयता और प्रकृति की छटा पूरे शबाब पर है। अपने आप में मस्त और भोलाभाला मौजी (धवन) और परम विनीत लेकिन मेहनतकश अर्द्धांगिनी ममता (अनुष्का) माहौल को रंगीन बनाये हुए हैं। इनकी जिंदगी में ढेर सारी बाधायें हैं। लेकिन उतार-चढ़ाव से भरी जिंदगी की इन्हीं पगडंडियों पर चलते हुए वे अपने सिलाई-बुनाई (टेलरिंग) बिज़नेस को जमाने में लगे हैं। सुई-धागा फिल्म बड़ों-वयस्कों के लिए एक टिपिकल किस्म की काल्पनिक डिज्नी या कहें पिक्सर एनिमेटेड लोक का निर्माण करती है, जहाँ नाचीज़ और मानव की जीजीविषा का हर कीमत पर जश्न मनाया जाता है।

 क्या यह विषय का सरलीकरण है? बेशक। लेकिन क्या आप और इसके कायल है ? इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। अनुष्का और धवन एक छुई-मुई कपल हैं। संयुक्त परिवार में रहते हैं। चंदेरी के एक नन्हें-से कस्बे के निवासी हैं। अभी-अभी शादी हुई है। लेकिन इतना समय ही नहीं मिल पाया है कि वे एक-दूसरे को ठीक समझ पायें या घुल-मिल पायें। यहाँ नाटकीयता नहीं पिरोयी गयी है।

उनके घर में पैसे की भारी कड़की है। सपने देखना उनके लिए काफी महँगा साबित हो सकता है। शुरुआत से ही हमें बताया जाता है कि उद्यमी बनना इनसान की जिंदगी में घोर अँधियारा लेकर आता है। इसका सबूत है की मौजी के दादा अपने टेलरिंग बिज़नेस के कारण कंगाल हो गये थे। उसका साया आज भी मौजी की जिंदगी पर पड़ रहा है। वह एक-एक पैसे के लिए मोहताज है। इसलिए वे स्टार्ट अप बिज़नेस के सपने देखने की जगह व्यावहारिक होना बेहतर समझते हैं।

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