रक्षाबंधन वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में

शुभांशु जैन , जबलपुर।

हमारा यह देश महान है । इस भूमि के धरा गगन पर दिखाई देने वाले सातों रंगों का उत्स एक ही है ।एक मे अनेकता और  अनेक में एकता भारत की दार्शनिक व्याख्याओं में ही नही,यहां की सांस्कृतिक परम्पराओ में भी व्याप्त है ऐसा ही रक्षाबंधन भारत के पौराणिक ग्रंथों के साथ साथ लोक व्यवहार में भी प्रचलित है जहां एक ओर बहन भाई के हाथों में रक्षा सूत्र बांधती तो भाई उसे जीवन भर रक्षा करने का वचन देता है ।

पर वर्तमान के परिपेक्ष्य में अब रक्षा बंधन का केवल खून के रिश्तों से बाहर निकल कर सर्वव्यापी होने की आवश्यकता है 

एक ओर तो हम अपनी बहन की रक्षा का वचन देते है पर वही दूसरी ओर किसी ओर की बहनों पर अत्याचार कर रहे है चाहे वह अश्लील गलियों हो ,छेड़छाड़ हो,या प्रतिदिन बढ़ती देश में दुष्कर्म बलात्कार की संख्या बताती है कि हमने रक्षाबंधन को सिर्फ औपचारिता तक ही सीमित कर दिया यदि रक्षाबंधन के सही महत्व को हम समझते तो कभी किसी ओर की बहनों के साथ वह कार्य नही करते जो अपनी बहन के साथ हम देखना पसंद नही करते है ……

गर्भवती मां ने अपनी छोटी से बेटी से पूछा- बेटा तुम्हे भाई चाहिए या बहन 

तो मासूम ने बेटी ने बोला मां मुझे भाई चाहिए 

तो माँ ने फिर पूछा बेटा -किसके जैसा भाई चाहिए।

बेटी बोली माँ -मुझे रावण जैसा भाई चाहिए

मां ने घूरा, पिता ने चिल्लाया क्या बकती है बेटा राम जैसा भाई बोल ,कृष्ण जैसा भाई बोल ,महावीर जैसा भाई बोल 

पर तू क्या कहती है रावण जैसा भाई चाहिए 

बेटी बोली हाँ मां रावण जैसे भाई की आवश्यकता आज है जो पराई स्त्री सीता का अपहरण करने के बाद जिसने कभी उसको छुआ नही उसके साथ गलत आचरण करने का प्रयास नही किया ,अपनी बहन सूप नखा के अपमान पर जो युध्द करने तैयार हो गया ऐसे रावण की आज घर घर जरूरत है ……..

*इज्जत किया करो बहनों की*

*फर्क क्या पड़ता है अपनी हो या गेरो की

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