ज़िन्दगी का सफर दिखाती कारवां

दो पीढ़ियों के अंतर को खूबसूरती से बयाँ करती हैं फ़िल्म कारवां। ये जिंदगी को देखने का अलग नज़रिया दिखाती हैं। फ़िल्म का कॉन्सेप्ट अच्छा है लेकिन इसमें बहुत कमियां भी हैं। जो इसे अपने मकसद में कामयाब नही होने देती।

कहानी – 

ये कहानी है अविनाश राज पुरोहित ( दिलकर सलमान ) की जो फोटोग्राफर बनना चाहता था लेकिन अपने पिता के दबाव में वो एक IT कंपनी जॉइन कर लेता हैं। ऑफिस उसे जेल की तरह लगता था। अचानक उसे एक फ़ोन आता हैं और उसे पता चलता है कि उसके पिता की मृत्यु हो गई हैं। ये खबर सुनने के बाद अविनाश में ज्यादा फर्क नही पड़ता क्योंकि अविनाश और उसके पिता के संबंध ठीक नही थे। वो जब अपने पिता की बॉडी लेने जाता हैं तो उसे पता चलता है बॉडी एक्सचेंज हो गयी हैं। ऐसे में वो अपने मज़ाकिया दोस्त शौकत ( इरफ़ान खान ) और तान्या ( मिथिला पारकर ) के साथ बॉडी लेने जाता हैं। और यहाँ से शुरू होता हैं इनका असली सफर। इस सफर में अविनाश का नज़रिया बदलता हैं । जिस पिता को वो बुरा मानता था उनमे उसे अच्छाई नज़र आती हैं। ऐसा क्या होता हैं उनके सफर में ये जानने के लिए आपको अपने घर से सिनेमाघर तक का सफर तय करना होगा।

अभिनय – 

इरफान का प्रभावकारी हैं। अपने कैरेक्टर के साथ उन्होंने पूरा जस्टिस किया है। वही सलमान अपनी डेब्यू मूवी के साथ अपने अभिनय के साथ छाप छोड़ने में कामयाब रहे है। बात करे मिथिला की उनकी अदाकारी ठीक ही हैं।

समीक्षा – 

हर नई पीढ़ी समझती हैं कि पुरानी पीढ़ी उन्हें नही समझती और इस बात पर ध्यान नही देती की पुरानी पीढ़ी उन्हें अनुभव से ठोकरें खाने से बचाती हैं। इस सीख के साथ बनाई कारवां उतनी प्रभावकारी नही रही। पहला भाग बहुत धीमा हैं। कुछ बाते हैं जो हज़म नही होती जैसे पिता और पुत्र के रिश्ते कितने ही असामान्य क्यों ना हो लेकिन पिता की मौत से पुत्र प्रभावित ना हो ये थोड़ा अजीब था। पिता की बॉडी लेने जाते समय पुत्र अपने दोस्तों के मस्ती कर रहा है, ये आसानी से समझ से परे से है।

फ़िल्म – कारवां

निर्देशक – आकर्ष खुराना

स्टार कास्ट – इरफान खान,मिथिला पारकर, दिलकर सलमान

ड्यूरेशन – 1 घंटे 54 मिनट

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